Saturday, 20 January 2018

RTI Act it is down fall Indians are money minded

In India Government has passed a law in 2005 Right of Information Act for the transparency in the government department. Unfortunately due to illiteracy and selfishness among Indian citizen this RTI law could not provide any satisfactory beneficial result to the public to eradicate corruption. It is world known that Indians are money minded and to make money they can do every illegal work. 

To make India corruption free some people took initiative to file RTI application to furnish information from government department and public got information from the various govt. departments.
In starting period state information commission used to help applicant and pressurized to public information to provide required information to applicant within stipulated time. Now in present totally scenario has been changed and the state information commission has started to help government public officers.
In the state information commission office if the public information officer do not appear or miss his presence in the bench in that time commissioner give him relief but by chance any applicant miss any hearing date any time in that situation commissioner immediately dispose of the case.
If applicant opposed it in that time the commissioner reply in hard tune to applicant if you are not satisfied file a case in high court against it.
Suppose a common man or social worker seek any information from government department to 
expose corruption and file application to seek information have to spend all expenditure from his pocket and other hand government employee public information officer spend all money from government exchequer. 

At last Indian government’s minister and officer class has killed the tool of a common man Right of Information Act so that public can’t expose the corruption in government department.
Shri Paul Sharma President
RTI & Human Rights Activist
www.rtihumanright.com
9417455666





Tuesday, 9 January 2018

महिला सशक्तिकरण तभी होगा जब महिलाये पुरुषो की अंगुली पकड़कर नहीं बल्कि खुद मंजिल की तलाश में निकलेगी

भारत में सदियों से घरो में बंद व परदे में रहने वाली महिलाओं को अब घरो  की चारदिवारी से बाहर आकर पुरुष प्रधान समाज में अपने अधिकारों की  प्राप्ति के लिए एक बहुत बड़ा संघर्ष करना होगा यह तभी सम्भव होगा जब वे पुरुषो की अंगुली पकड़कर नहीं बल्कि खुद अपने रास्ते और मंजिल की तलाश करें। 

एन जी ओ बेलन ब्रिगेड ने महिलाओं के अधिकारों हेतू समाज में एक आन्दोलन की शुरूआत की है जिसके तहत नारी तूँ अबला नहीं झाँसी की रानी है तुझे अब देश को भ्रस्टाचार, भाई- भतीजाबाद, चोरबाज़ारी व बेईमान नेताओ के चगुल से आज़ाद कराना है।
लुधियाना के  नगर निगम चुनावों में सभी राजनीतिक पार्टियों के लोग पार्षद  की सीट पाने के लिए अपनी दावेदारी ठोक रहे हैं चाहे यह दावेदार समाज हित के लिए कुछ कर  कता है या नहीं। 

लुधियाना में इस बार 50 प्रतिशत सीटें नगर निगम में महिलाओं के लिए रिजर्व हो चुकी है और सभी वार्डों में जो मर्द चुनाव लड़ने के इच्छुक थे उनके वार्ड महिलाओं के नाम रिजर्व हो चुके हैं। और अब यह मर्द अपनी अपनी पत्नियों को कन्धों पर बिठाकर टिकट लेने के लिए घूम रहें हैं। अधिकतर महिलाऐं घर में खाना बनाने व घर गृहस्थी का काम ही करती है और इन घरेलू महिलाओं को उनके घर वाले अपनी पहुँच से टिकट दिलवा देते हैं और ऐसी महिलाऐं जो चुनाव जीतने के बाद भी घरेलू ही रहती हैं और उनके पति परमेश्वर ही सारा पार्षद का काम खुद करते हैं जिन्हे पति पार्षद के नाम से पुकारा जाना लगा है। 

बेलन ब्रिगेड की राष्ट्रीय अध्यक्ष अनीता शर्मा ने  जनता से अपील की है कि वोटर केवल उन्ही महिलाओं को वोट दे जो पहले ही समाज में निष्काम, निःस्वार्थ  काम कर रही हैं चाहे वो किसी भी पार्टी में हो या किसी राजनैतिक पार्टी में न भी हो सिर्फ यह ध्यान रखे कि क्या वो समाज भलाई के काम करने अग्रसर हो । और जो महिलाऐं नगर निगम चुनावों में अपनी पति के कन्धों पर बैठ कर वोट मांगने आएंगी उन्हें जनता वोट न दे क्योकि यह लोग सत्ता के भूखे हैं। इन्हे समाज सेवा या लोगों की भलाई से कोई मतलब नहीं है। उन्होंने तो चुनावों में अपनी बीबी को जीताकर कुर्सी पर बिठा कर पार्षद पति ही बनंना है वार्ड के 
समाज के काम हो या न हो। 

नगर निगम चुनावों में टिकट उन्ही महिलाओं को दिया जाए जो पहले ही समाज में जनता की भलाई के लिए कार्य कर रही हैं। वास्तव में यही महिला सशक्तिकरण होगा जब महिलाये खुद पुरुष प्रधान समाज में आगे आकर अपने हक़ व समाज के जरूरतमंद लोगो के दुख तकलीफो लिए के लिए लड़ेगी। 
अब समय आ गया है महिलाये अपने अधिकारों को पाने के  लिए घरो से बाहर आकर अपनी लड़ाई आप लड़े।  
श्रीपाल शर्मा 
आर टी आई ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट 
09417455666 

Saturday, 6 January 2018

एन जी ओ के नाम पर झुग्गी झोपडी वाले बच्चो को पढ़ाने के नाम पर मंत्रिओं के साथ साहूकारों की फोटो खिचवा कर पैसे बटोर रहे है


बड़े शहरो में कई लोगो ने एन जी ओ बनाकर इन्कम टैक्स विभाग से 80जी लेकर झुग्गी झोपडी वाले गरीब बच्चो को इकक्ठा करके उन्हें पढ़ाने के नाम पर धन्धा बना लिया।
गरीब बच्चो को पढ़ाने के नाम पर यह  एन जी ओ के कर्ता धर्ता एक बच्चे का सालाना खर्चा  2000 रुपये अमीर लोगो या कम्पनी वालों से लेते है बड़ी बड़ी कम्पनी और फर्म के मालिक 10 बच्चो से लेकर 100 बच्चो तक की फीस इन तथाकथित एन जी ओ को दे रहे है। 
एक एन जी ओ वाला जिसकी पहुँच आई टी विभाग, बड़े अफसरों व समाचारपत्रों के मालिकों तक है वह 5000 बच्चो को पढ़ाने का दावा करता है यानि कि वह हर साल गरीब झुग्गी झोपडी वाले बच्चो को पढ़ाने के नाम पर लाखो रूपए इकक्ठे कर रहा है इसे कोई पूछने वाला नहीं है कि इतना रुपया कहा से आता है और कहाँ जाता है। 

पांच हज़ार बच्चो को पढ़ाने का दावा करने वाला यह शख्स कैसे मशहूर हुआ इसके पीछे भी एक राज है। इस शख्स ने गरीब मजदूरों के कई बच्चो को नाचने गाने भाषण देने में एक्सपर्ट किया हुआ और साल में कई सांस्कृतिक कार्यक्रम  इन्ही बच्चो को स्टेज पर नचा कुदा कर करता है। सयाने लोगो का कहना है कि कलयुग में पैसा दिमाग और फरेब से ही कमाया जा सकता है। 

झुग्गी झोपडी वाले बच्चो को पढ़ाने वाले इस शख्स का नोट इक्क्ठे  करने ढंग देखिए।  जब यह शख्स किसी बड़े आडोटोरियम में बच्चो को नचाता है तो वहा इसके कार्यक्रम में कोई मिनिस्टर या गवर्नर चीफ गेस्ट होता है। इसी रंगारंग कार्यक्रम में  शहर के मुख्य लोग जिनमे कम्पनी और फर्मो के मालिक मैनेजर डायरेक्टर अमीर लोग सरकारी अफसर डाक्टर आदि जो झुग्गी 
झोपडी वाले बच्चो को पढ़ाने वाले इस शख्स को लाखो रुपया दान देते है हाल की पहली लाइन में बैठे होते है।  दूसरी तरफ बच्चो को पढ़ाने वाली टीचर एक जैसे रंग की साड़ियों में मेकअप से निखरी हुई  कुर्सियों पर बैठे  झुग्गी झोपडी वाले बच्चो के बीच में खड़ी होती है। 
स्टेज पर एन जी ओ चलाने वाला शख्स खड़ा होकर माया देने वाले सभी लोगो का बार बार नाम लेता है और किस सेठ को स्टेज पर बुलाना है या नहीं इसी के हाथ में होता है जो अमीर लोग ज्यादा धन देते है उनकी फोटो मिनिस्टर या गवर्नर के साथ भी हो सकती है। गौरतलब है कि यहाँ पर कई इन्कम टैक्स व अन्य विभागों के अफसर भी फ्रंट की कुर्सियों पर विराजमान होते है जिन्हे देखकर शहर के दो नंबरी अमीरो का होंसला बढ़ जाता है जिससे वे गरीब बच्चो को पढ़ाने के नाम पर ज्यादा ज्यादा उन्हें गोद लेते है।
 एक साहूकार जिसे सरकारी दफ्तर में कोई चपड़ासी नहीं जानता जब एन जी ओ वाला शख्स  उसे स्टेज पर बुलाकर उसे मंत्री के साथ खड़ा करके उसे सम्मान पत्र दिलवाता है तो यह साहूकार क्यों नहीं 100 -200 बच्चो को पढ़ाने का जिम्मा लेगा। उसकी फोटो अगले दिन अखबार में भी छपी होगी सेठजी को समान्नित किया गया।  वैसे तो हिंदुस्तान के लोग इतने स्वार्थी है कि बिना मतलब के कोई किसी को एक फूटी कौड़ी भी नहीं देता।    
शहर की कॉरपोरेट कंपनी दो नंबर की इन्कम को एक नम्बर में कन्वर्ट करने के लिए 80 जी वाली एन जी ओ को दिल खोलकर डोनेशन देती है पता चला है कि 80 जी वाली यह एन जी ओ  तीस -चालीस  परसेंट रुपये लेकर सौ परसेंट की रशीद दे देते है।  
क्या प्रशासन व इन्कम टैक्स विभाग ने इन एन जी ओ जो  गरीब झुग्गी झोपडी वाले बच्चो को पढ़ाने के  नाम पर लाखो रूपये इक्क्ठे कर रहे है क्या उतने बच्चे को यह पढ़ा रहे है जितने बच्चो को पढ़ाने का यह दावा करते है ? क्या सरकार इस की जांच कराएगी ? 
प्रशासन को क्या पता नहीं है कि सरकार ने बच्चो को शिक्षा देने के लिए सरकारी स्कूल खोल रखे है यहाँ पर टीचर 30 हज़ार से लेकर 60 हज़ार रूपये मासिक वेतन लेते है। कई स्कूलों में बहुत कम बच्चे होते है टीचर इतनी तन्खाव लेने के बाद भी बच्चो को नहीं पढ़ाते क्या अफसरों और एन जी ओ वालो को इस तरफ ध्यान नहीं देना चाहिए।

क्या ?अफसरों ने किसी एन जी ओ वाले शख्स को जो झुग्गी झोपडी वाले बच्चो को पढ़ाने का दावा करते है उस साहेब को सलाह दी है कि वे अलग से बच्चो को पढ़ाने की जगह सारे बच्चो को सरकारी स्कूलों में दाखिल कराये। सरकार करोड़ो रुपया सरकारी स्कूलों पर खर्च करती है इसलिए देश का नागरिक होने के नाते हमारा भी  फ़र्ज़ बनता है कि हम सरकारी स्कूलों में बच्चो को अच्छी शिक्षा दिलवाने में उनका सहयोग करे। 
 देश में  कई एन जी ओ के नाम पर झुग्गी झोपडी वाले बच्चो को पढ़ाने के नाम पर मंत्रिओं के साथ साहूकारों की फोटो खिचवा कर पैसे  बटोर रहे है ऐसे लोग समाज का क्या भला करेंगे जिनके बगल में छूरी मुंह में राम राम है। 
श्रीपाल शर्मा सोशल वर्कर 
आर टी आई ह्यूमन राइट एक्टिविस्ट 
rtihumanrights.blogspot.com 
09417455666 

Wednesday, 3 January 2018

स्वामी विवेका नन्द जी की बात आज तक लोगो को समझ नहीं आई है

स्वामी विवेका नन्द ने कहा था किसी गरीब को एक दो बार मुफ्त खाना खिलाकर हम उसकी गरीबी दूर नहीं कर सकते इसलिए गरीब को यदि हमे कुछ देना है तो उसे इस काबल बनाओ की वह जिन्दगी भर खुद कमा कर खाये। 

आजकल लोग सस्ती शोहरत पाने के लिए (पैसे लेकर खबर छापने वाले अखबारों में अपनी फोटो छपवा कर) गरीबो को खाना व पुराने कपड़े बाँट कर उनकी गरीबी दूर कर रहे है या गरीबो को और निक्कमा व आलसी बना रहे है कि वे कमाकर न खाये।
अमीर लोग धार्मिक कीर्तन व जागरण करके खाने पीने पर लाखो रूपए खर्च कर देते है लेकिन यह लोग अपने किसी नोकर, रिश्तेदार या पड़ोस में बीमार पड़े किसी जरूरतमन्द की कभी मदद नहीं करते।
क्या हमारा धर्म यही सिखाता है क्या हमारे लोगो में इन्शानियत खत्म हो चुकी है
हो सकता है आज आप अमीर है और कल को आप भी गरीब हो सकते है क्योकि समय बहूत बलवान है।

आज हमारे देश के लोग भी इतने स्वार्थी कमजोर आलसी और कामचोर हो चुके है कि अपने हक़ की लिए लड़ने की बजाय मुफ्त के माल पर जीने की सोच रहे है।
तभी तो हमारे देश के भृष्ट बईमान हरामखोर नेता भी भारत देश के लोगो की नब्ज पहचान चुके है कि गरीब लोगो को काम करके कमाने के काबिल न बनाओ और चुनावो में लैप टॉप, टी वी और साइकल बांटकर इनसे वोट लो। 
 
तभी तो सरकार सस्ता राशन मुफ्त उज्जबल गैस सिलेण्डर आदि देकर गरीब को और गरीब, कामचोर और निक्कमा बना रही है।
दोस्तों ! हमारे लोगो में सोचने की शक्ति देश की भृष्ट राजनीति ने खत्म कर दी है।
जो सरकार मुफ्त बिजली पानी राशन आदि जनता को देने का वायदा करती है ऐसी सरकार राजनीति पार्टी व नेता लोग कभी भी देश का कल्याण और समाज का भला नहीं करेगे।
आखिर में दो शब्द ।

150 वर्ष बीत गए अभी तक किसी को स्वामी विवेका नन्द की बात समझ नहीं आई है।
मोदी साहेब ! आप की डिजिटल कैशलेस वाली बात मेरे देश के प्यारे भाइयो और बहनो को कहा से समझ में आएगी।
भारत में आज भी लोग हेराफेरी बेईमानी से रुपया कमाकर धनवान बन रहे यह रुपया देश की जनता से गद्दारी करके और गरीबो के पेट पर लात मार कर ही  धनवानों द्वारा कमाया जा रहा। जिस देश में हर कोई नागरिक अपने स्वार्थ व लोभ के लिए एक दुसरे को लूटने के लिए बैठा हो उस देश का भविष्य कभी भी उज्जवल नहीं होगा। 
श्रीपाल शर्मा एक्टिविस्ट
09417455666

Saturday, 30 December 2017

Right of Information Act for the transparency in the government department

In India Government has passed a law in 2005 Right of Information Act for the transparency in the government department. Unfortunately due to illiteracy and selfishness among Indian citizen this RTI law could not provide any satisfactory beneficial result to the public to eradicate corruption.  It is world known that Indians are money minded and to make money they can do every illegal work.


To make India corruption free some people took initiative to file RTI application to furnish information from government department and public got information from the various govt. departments.
In starting period state information commission used to help applicant and pressurized to public information to provide required information to applicant within stipulated time. Now in present totally scenario has been changed and the state information commission has started to help government public officers.

In the state information commission office if the public information officer do not appear or miss his presence in the bench in that time commissioner give him relief but by chance any applicant miss any hearing date any time in that situation commissioner immediately dispose of the case.
If applicant opposed it in that time the commissioner reply in hard tune to applicant if you are not satisfied file a case in high court against it.
Suppose a common man or social worker seek any information from government department to expose corruption and file application to seek information have to spend all expenditure from his pocket and other hand government employee public information officer spend all money from government exchequer.
At last Indian government’s minister and officer class has killed the tool of a common man Right of Information Act so that public can’t expose the corruption in government department.
Shri Paul Sharma President
RTI & Human Rights Activist
9417455666



Saturday, 23 December 2017

मास्टर जी को भी ज़िंदगी भर यह किताब याद नहीं होती

भारत में अंग्रेज लार्ड मैकाले द्वारा शुरू की गई शिक्षा प्रणाली केवल देश के लोगो को क्लर्क तक ही ज्ञान देती है और लार्ड मैकाले की शिक्षा पद्धति हर  व्यक्ति के  सोचने की शक्ति खत्म कर देती है इस तरह एक छात्र पहली क्लास से लेकर एम् ए तक रट्टा ही लगाता रहता है और स्कूल का मास्टर राजनीति या इतिहास की एक ही किताब हाथ में पकड़ कर हर रोज़ बच्चो को पढ़ाता है और मास्टर जी को भी ज़िंदगी भर यह किताब याद नहीं होती और किताब पढ़ते-पढ़ाते स्कूल से रिटायर तक हो जाता है।   

आप किसी स्कूल में जाकर तीस साल पहले पढ़ने वाले बच्चो का स्कूल के प्रिंसिपल के दफ्तर के बाहर मैरिट में आने वाले स्टूडेंट्स का नाम पढ़े वहां पर 70 -80 प्रतिशत तक मैक्सीमम नम्बर  आते थे। 
दोस्तों अब मेरे देश के बच्चो का दिमाग नूडल्स पिज़ा बर्गर मंचूरियन खा खा कर  हार्ड डिस्क बन चूका है अब वे रट्टा लगा लगा कर 99 प्रतिशत मार्क ले सकते है। 
सोचने की बात है ? लक्कड़ वाली सीढ़ी कैसे चढ़ी जाती है यह उन्हें नहीं आता लेकिन उनकी उंगलिया मोबाइल की स्क्रीन टच पर बहुत तेज दौड़ती है।  
आज सी बी एस सी स्लेबस पढ़ने वाले बच्चे  99 प्रतिशत मार्क जरूर ले लेते है लेकिन यह बच्चे अंधेरे में जाने से डरते है दूसरी तरफ 33 प्रतिशत मार्क लेने वाले सरकारी स्कूलों के बच्चो को चाहे अंधेर कोठरी या गुफा में भेज दो वे डरते नहीं क्योकि उनके 33 प्रतिशत ज्ञान और 66 प्रतिशत जगह में साहस और हिम्मत होती है वे हर फिजिकल फील्ड में कामयाब रहते है। 
अगर वास्तव में हम भारत को डिज़िटल बनाना चाहते है तो समय के अनुसार जो काम कम्प्यूटर की हार्ड डिस्क सॉफ्टवेयर कर सकते है उसको हमे बच्चो के दिमाग से नहीं करवाना चाहिए उनके दिमाग में फिजिक्स केमिस्ट्री मैथ को रट्टा लगवा कर घुसेड़ने की जगह उन्हें प्रैक्टिकल एजुकेशन की तरफ लेकर जाए। 
आज देश के युवा इंजीनियर डॉक्टर वकील मजिस्ट्रेट आई ए एस, आई पी एस जो थेओरी में पास होकर डिग्री तो हासिल कर लेते है लेकिन प्रैक्टिकल में उन्हें कुछ नहीं आता। 
जिसका नतीज़ा हम देख रहे 71 साल की आज़ादी के बाद भी भारत देश हर क्षेत्र में पिछड़ा हुआ है। 

अंत में हम सभी को इस पर विचार करना चाहिए ताकि भारत के नन्हे मुन्ने बच्चे किताबो के रट्टे लगा कर 99 प्रतिशत मार्क लेने की दौड़ से बाहर आकर प्रैक्टिकल प्रैक्टिस में अपना अधिक समय लगाए ताकि हमे चीन जर्मनी फ्रांस से नई टेक्नोलॉजी की मशीनरी मंगबाने की जगह भारत के युवा भारत में ही नए आविष्कार करे। 
श्रीपाल शर्मा 
आर टी आई ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट 
09417455666 
      

Friday, 22 December 2017

डाक्टर साहेब ने बेटे की शादी पर करोड़ो खर्च कर दिया

कुछ दिन पहले लुधियाना के सिविल लाइन में खुले एक प्राइवेट हॉस्पिटल के मालिक डॉक्टर ने मुझे बताया कि उसने अपने लड़के की शादी बड़ी धूम धाम से की है और ऐसी शानो शौकत वाली शादी शायद लुधियाना में नहीं हुई होगी। 

डाक्टर साहिब की यह बात सुन कर मै सोच में पड़ गया कि एक करोड़पति अनपढ़ व्यापारी व पढ़े लिखे डॉक्टर का  अपने परिवार के लिए एक ही सपना रह गया है कि एक बड़ी कोठी, बड़ी कार और बच्चो की शादी धूमधाम से हो। बस हिन्दोस्तान के लोगो की यही ज़िदगी है। 
क्या आप जानते है ? भारत देश में डाक्टर साहेब अपना सपना पूरा करने के लिए मरीजों को दोनों हाथो से लूटते है और ये गरीब का खून तक निचोड़ लेते है  कई बार लोग डॉक्टर से इलाज़ करवाते करवाते मरीज़ की जान  बचाने के लिए अपना घरबार भी बेच देते हैं। अगर मरीज़ मर जाये तो ये डॉक्टर साहेब  तब तक डैड बॉडी को उठाने नहीं देते जब तक इनके हॉस्पिटल का बिल नहीं मिल जाता।   

थोड़ा सा दिमाग में विचार करें ?
केवल एक रात में  अपने बेटे की शान से करोड़ो रुपया खर्च करके शादी करने वाले डाक्टर ने यह रुपया कितने मरीज़ो के परिवार से  इलाज़ के नाम पर लूटा होगा। यह तो ईश्वर ही जानता है ?
पर मुझे तो डाक्टर साहेब की सोच पर हैरानी हो रही जिसने कहा कि मैंने बेटे की शादी पर करोड़ो खर्च कर दिया और ऐसी शादी लुधियाना शहर में पहले कभी नहीं हुई। 

अफ़सोस ! अगर डॉक्टर साहेब यह कहता कि मैं लुधियाना शहर के लोगो की बिना लालच 40 साल से निस्वार्थ  सेवा कर  रहा हूँ  अगर आज  मेरे पास लाखो करोड़ो रुपये नहीं है लेकिन मेरे और मेरे परिवार की खुशहाली के लिए हज़ारो लोगो की दुआए मेरे साथ है जिनका मैंने बिना पैसे लिए इलाज़ किया है। 
श्रीपाल शर्मा 
आर टी आई ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट 
09417455666